flash kalpana 1
चिट्ठियों के प्रति हमेशा से एक खिंचाव सा रहा। लम्बे घुंघराले बालों से भी। सायों-चुड़ैलों की कहानियों से भी। और इनके प्रति मेरे डर ने इनसे परस्पर दूरी बनवा कर रखी। बेजान बस्तियां और बिना जवाब के सवाल जब आँखों के सामने से गुज़रते हैं तो अक्सर बदन के किसी कोने से सिहरन किसी कोने तक दौड़ जाती है। देह अपने भीतर बहुत कुछ छिपा लेता है। सिहरन जानती है की उसकी भलाई छिपे रहने में है, तो वो अपने पाओं में रफ़्तार बांधे रहती है। ख़ैर क्या लिखना है? कितना लिखना है? फॉर्मेट? 5 मार्कर वाला इनफॉर्मल या 10 मार्कर वाला फॉर्मल? आखिर किसे लिखना है? आखिर हम किस लोभ में ये लिख रहे हैं? आह! प्यौर पीपल प्लीज़र!
कहीं पढ़ा की आप वो नहीं है जो आप कहते हैं, आप वो हैं जो आप करते हैं। ऐक्शन्स, आदतें, एक फ्रेमवर्क जिसके थ्रू हम ऑपरेट करते हैं, इनसे शायद अब हमारी पहचान तय होने लगी है। आप अच्छे इंसान हैं या बुरे इंसान है, आपको पहचानने का पैरामीटर एक ये भी है। मोरल इंसान शायद अच्छा इंसान होता है। नहीं, वाकई में एक मोरल इंसान एक अच्छा इंसान होता है। अक्सर अच्छे इंसान अच्छे इमारतों में रहते हैं। ऐसा सबका मानना है, पर सब अच्छी इमारतें अच्छा मुहल्ला, अच्छा माहौल अपने लिए ढूंढ नहीं पाते, ये सब बस कुछ एक-आध के पास है बांकी बस पास में दूरी बना कर उन्हें देख सकते हैं । उनके मकानों को पसीने से सान कर बना सकते हैं, उनके घरों में पर पानी नहीं पी सकते।
]घर एक फ्लैट में है । फ्लैट चार माल्हे की एक बिल्डिंग में है। बिल्डिंग यहाँ से वहां तक फैली हुयी एक कैंपस में है। सबसे बीच एक पार्क है, फिर चारों ओर एक पतली सड़क है, चौकोर सड़क, चार माल्हे की चार सीढ़ी वाली चार बिल्डिंगों के घेरे में है। यहाँ से बाहर निकलो तो सड़क के साथ एक सड़क जितना चौड़ा नाला, सड़क की शुरुआत से सड़क के साथ चलते आ रहा है। ताजुब की बात है की इस सड़क के ख़तम होने के बाद नाले को तिरछे मोड़ लेने की आदत है, सो उस मोड़ से एक और सड़क की शुरुआत हो जाती है।
पिछली सड़क जहाँ ख़तम हो गयी थी, वहां नाले को पार करने को एक पुल बनाया गया है। जिन दिनो बांस के चरचरिया पुल को गिट्टी-सीमेंट और छड़ों से लैस करके जीवंत किया जा रहा था, एक औरत बस्ती से आकर खड़ी होने लगी। दूर-दूर तक कुछ नहीं था। अमीर कहते नहीं थकते की गरीब आलसी है। गरीब वीराने में भी उम्मीद ढूंढते नहीं थकता।
औरत ने वीराने को टटोला, ठण्ड तेज़ थी, मज़दूर ठण्ड में जल्दी चले जाते है। उसने सारा दिन उन्हें देखा, और फिर वापस अपनी बस्ती लौट आयी । बस्ती से बिल्डिंग बहुत दूर नहीं थे, पर वहां नौकरी नहीं मिलती, सिफारिश चाहिए होती है। घर में जितनी बीड़ी उसे मिली, वो लेके अगले दिन पुलिया के पास खड़ी हो गयी। पुल बनते-बनते और नालों के दोनों तरफ की सड़क बनने तक औरत की अपने एक गुमटी पुल के सिरहाने खुल चुकी थी। बीस साल बाद उसकी सबसे बड़ी कम्पटीशन उसकी बेटी की गुमटी है, जो ठीक उससे दस मीटर दूर, बाएं हाथ में खुली है। बेटी ऑनलाइन पेमेंट लेती है, बुढ़िया बहुत कुछ तो चिप्स रहती है।
बुढ़िया की बात इसलिए आयी क्यूंकि वो अपने साथ अपनी दुकान पर एक मोटी तेल पी कर पोसी हुयी लट्ठ और एक काला कुत्ता लेकर आती है, कुत्ता इस इलाके का नहीं है, आधा झबड़ा, आधा पहाड़ी है। बस्ती के बच्चे हर साल अपनी माओं से सुनते हैं की बुढ़िया जिन्हे पसंद नहीं करती, ये छोटा, अजीब कुत्ता उन्हें काट लेता है। तो नैचुरली बच्चे जब भी कुत्ते के बगल से गुज़रते हैं, उसपर लकड़ी-पत्थर फेंकते हुए भागते हैं। कुत्ता चूँकि छोटा है तो कई बार सड़क के जंगली कुत्ते भी उसे घेर लेते हैं, ये बेचारा पालतू अबोध उनसे मर-मुरा न जाए, तो बुढ़िया जंगलियों पर लाठी चला देती है।
जिस तरह बुढ़िया लाठी हाँक कर सबको दूर भगाती है उसी तरह मानो मन में भी एक बुढ़िया लाठी लिए बैठी रहती हो। आज-कल मैनिफेस्टेशन बहुत लोकप्रिय हो चला है। अगर किसी बात को बार-बार दुहराओ तो वो सच हो जाती है। बचपन का बोया अब काट रहे हैं । एक चुटकुला इतना दुहराए की सच हो आया। एक बुढ़िया बचपन में ही मर गयी । तब बहुत हँसी आती थी, बुढ़िया होने को तो जीना पड़ता है, बचपन में ही मरी तो बुढ़िया कैसे हुयी भला? हा-हा-हा-हा ! अब मानो जिस सड़क से गुज़रते हुए बचपन नाले में गिर गया, ये बुढ़िया वहीँ की मिटटी से निकलकर माथे में घर कर गयी । अब वो आने वाली हर बात को हाँक देती है । न सुख से बोध कराती, न दुःख देखने देती है। बुढ़िया मेरे चुटकले में कैद थी, सो अब रिहा होकर मेरे मन को कैद में रखती है । रिवेंज वाज़ सर्वड, एंड इट हैज़ बिन नथिंग बट कोल्ड सिन्स!
3/5/22
revenge was served and it has been nothing but cold ever since!
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