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उदासी

आओ उदासी, बैठो।  कहो, कैसे आना हुआ।  किन्हें खोजते हुए आई? ज़ख्म कौनसे साथ लाई?  कैसे मेरा ध्यान आया? साथ यहां तक क्या लाया? आओ उदासी, बैठो।  बहुत दिनों बाद आई हो। खिलते हुए फूल को देखो, कल तक ये मुरझा जाएगा। उगते हुए सूरज को देखो, कुछ देर,ये भी ढल जाएगा।  आओ उदासी, बैठो।  कैसे ख़्यालों का लाना हुआ।   किन रास्तों से गुज़री तुम? किन सैलाबों में उमड़ी तुम? कहाँ से सफर शुरू था किया?  किन ठोकरों ने घाव यह दिया?     आओ उदासी, बैठो। तुम्हारा साया स्वतः  तुमसे पहले था आया। दर ओ दीवार छू कर, टकड़ाकर लड़खड़ाया। ख़ुदके कमरे पर आकर,  ख़ुद ही खटखटाया।   कभी परदों को टटोले,  तो कभी बाँहों को खोले,  बेचैन होकर बस तेरा नाम बोले।      अरे! उदासी, बैठो।  कहो, कहां तेरा जाना हुआ? बस इतनी देर में लौट रही!  कहो, ये भी कोई आना हुआ? अगली बार आओ, तो  आहट को कहना, पहले चले आए,  अपने कमरे को आकर ज़रा खुदसे सजाए।   मन में दरवाज़े बहुत हैं,  अपना चिन्हा लगाए,  कहीं ऐसा न हो,...

flash kalpana 1

चिट्ठियों के प्रति हमेशा से एक खिंचाव सा रहा।  लम्बे घुंघराले बालों से भी।  सायों-चुड़ैलों की कहानियों से भी।  और इनके प्रति मेरे  डर ने इनसे परस्पर दूरी बनवा कर रखी। बेजान बस्तियां और बिना जवाब के सवाल जब आँखों के सामने से गुज़रते हैं तो अक्सर बदन के किसी कोने से सिहरन किसी कोने तक दौड़ जाती है। देह अपने भीतर बहुत कुछ छिपा लेता है। सिहरन जानती है की उसकी भलाई छिपे रहने में है, तो वो अपने पाओं में रफ़्तार बांधे रहती है। ख़ैर क्या लिखना है? कितना लिखना है? फॉर्मेट? 5 मार्कर वाला इनफॉर्मल या 10 मार्कर वाला फॉर्मल? आखिर किसे लिखना है? आखिर हम किस लोभ में ये लिख रहे हैं? आह! प्यौर पीपल प्लीज़र!     कहीं पढ़ा की आप वो नहीं है जो आप कहते हैं, आप वो हैं जो आप करते हैं। ऐक्शन्स, आदतें, एक फ्रेमवर्क जिसके थ्रू हम ऑपरेट करते हैं, इनसे शायद अब हमारी पहचान तय होने लगी है।  आप अच्छे इंसान हैं या बुरे इंसान है, आपको पहचानने  का पैरामीटर एक ये भी है।  मोरल इंसान शायद अच्छा इंसान होता है।  नहीं, वाकई में एक मोरल इंसान एक अच्छा इंसान होता है। अक्सर अच्छे इ...

पलाश के फूल

 Flame of the forest (Butea monosperma, Palash in Hindi) is a native of our subcontinent and has an eye-catching fower from which is derived a traditional colour of the Holi festival. Sun-dried petals of this fower are rich in dyes that can be extracted by water...  अख़बार पढ़ रही थी , डाई के ऊपर किन्ही ने कुछ लिखा था । आर्टिफीसियल डाई से पानी और क्लाइमेट का कितना नुक्सान होता है, ये बताते -बताते वे कुछ देसी डाई के नाम बताने लगे, जिन्हे इस्तेमाल में लाना बहतर  माना जाएगा, दारुहल्दी, सार्वज्जया , और तीसरा, पलाश के फूल।   फ्लेम ऑफ़ द फॉरेस्ट।  इंस्टाग्राम पे एक वीडियो कई बार दिखी थी की किसी पालतू जानवर को जब कोई बात कहते हैं जिसमे उनकी मनपसंद चीज़ों के नाम हों, तो वो उन नामों के आने पर अपना सर तिरछा कर लेते हैं, मानो इस एक बात से ज़ियादा ज़रूरी और कुछ नही।  ठीक वैसे ही स्वतः मेरा सर टिल्ट हुआ, और टिल्टेड ही रह गया।  जब तक ये रिएक्शन मन में रजिस्टर हुयी, तब तक आर्टिकल समाप्त हो चुका था।  इससे पहले अगले आर्टिकल तक जाते, मन ने सवाल किया की ये अचानक ऐसे...