पलाश के फूल
Flame of the forest (Butea monosperma, Palash in Hindi) is a native of our subcontinent and has an eye-catching fower from which is derived a traditional colour of the Holi festival. Sun-dried petals of this fower are rich in dyes that can be extracted by water...
अख़बार पढ़ रही थी , डाई के ऊपर किन्ही ने कुछ लिखा था । आर्टिफीसियल डाई से पानी और क्लाइमेट का कितना नुक्सान होता है, ये बताते -बताते वे कुछ देसी डाई के नाम बताने लगे, जिन्हे इस्तेमाल में लाना बहतर माना जाएगा, दारुहल्दी, सार्वज्जया , और तीसरा, पलाश के फूल। फ्लेम ऑफ़ द फॉरेस्ट। इंस्टाग्राम पे एक वीडियो कई बार दिखी थी की किसी पालतू जानवर को जब कोई बात कहते हैं जिसमे उनकी मनपसंद चीज़ों के नाम हों, तो वो उन नामों के आने पर अपना सर तिरछा कर लेते हैं, मानो इस एक बात से ज़ियादा ज़रूरी और कुछ नही। ठीक वैसे ही स्वतः मेरा सर टिल्ट हुआ, और टिल्टेड ही रह गया। जब तक ये रिएक्शन मन में रजिस्टर हुयी, तब तक आर्टिकल समाप्त हो चुका था। इससे पहले अगले आर्टिकल तक जाते, मन ने सवाल किया की ये अचानक ऐसे क्यों हुआ? नेचुरल डाई ही तो है! इसमें इतना क्या चौंकना?
अभी पिछले महीने ही फाइनल किया की मुझे दुनिया में दो नहीं तीन फूल सबसे प्रिये है। पिंक पर्सलेन, देसी गुलाब के खुशबु से लैस फूल और पलाश के फूल! बचपन तो याद नहीं पर शायद इन्हे कभी भी हाथों से नहीं छुआ, महक तक नहीं सूंघी। बस अपने तनों पर लगा देखा जब भी बिहार से गया होकर झारखण्ड आना-जाना हुआ। एंड दे लुक्ड फियर्स !
पर, अपनी पसंद की चीज़ दिखने पर ख़ुशी होती है, जो महसूस किया वो ख़ुशी नहीं थी। ये लगाव नहीं था, हक़ था जो मैंने माना हुआ की मेरा पलाश के फूलों पर ह। उनके आकार पर है, उनके रंग, उनके टेक्सचर पर ह। भले ही मुझे मालुम न हो की वास्तव में ये कैसे है। पर इतना मालुम है की ये मेरे है। इनपर मेरी मिल्कियत है। टेर्रीटोरिअलिटी, स्वामित्व, अधिकार, घुमा फिरा के यही तीन -चार शब्द मन में आये।
कई साल पहले ये मान लिया था की अगर कभी हिंदी या मैथिलि में कुछ पब्लिश करेंगे, तो उसका नाम यही होगा। पलाश के फूल। तभी समझ नहीं आया था की ये बात मन में क्यों आयी। पर अभी जब वो सारे वाकये आँखों के सामने से गुज़र रहे जिनमे मेरा और इन फूलों का आमना सामना हुआ है तो कुछ ही बातें कॉमन और कांस्टेंट है। दे ऑल्वेज़ स्टूड आउट। बैकग्राउंड में मानसून के बदौलत लहलहाते हुए जंगल हो या मार्च के महीने के सूखे हुए झाड़, इन फूलों पर आपकी नज़र सबसे पहले पड़ेगी और सबसे आखिर तक टिकी रहेगी। ये इंसान को बांधे रखते हैं। सिर्फ आपका ध्यान अपने ऊपर नहीं रखते, ये आपके साथ अपने रंग को, अपने रूप को, अपने होने के एहसास को साथ वापस भेजते हैं।
इनका यूँ आपके साथ हो लेना शायद मुझे छू गया हो। शायद इसलिए य्ये इतने अच्छे डाई भी हैं। सूखे हुए फूल से आसानी से डाई एक्सट्रेक्ट भी हो जाती है और नाममात्र पानी के साथ कपड़ों पर अपनी छाप पे छोड़ देती है। हैसल फ्री! एंड परमानेंट!
शायद ऊमर की ये वो ब्रैकेट चल रही जब आप इन दो तीज़ों को बिटवीन द लाइन्स ही सही, पर खोज रहे हो। ये वो दौर है जब सब पलक झपकते बदल जाता है और ये वो उम्र है जहाँ कितनी भी आँखें मीचो, ख्वाब हो या हक़ीक़त, सब टूट जाता है। ऐसे में कोई ऐसी चीज़ नसीब हो जो अब न अपना भाग्य बदल सकती और न आपके भाग्य में बदलाव ला सके तो जुड़ाव महसूस हो ही जाता है!
सोच रही हूँ, की आगे की विश्लेषण बाद में करूँ। अब अगली खबर भी इंतज़ार में है। सबको वक़्त देना पड़ता है। हर घटना को वक़्त चाहिए...
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