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उदासी

आओ उदासी, बैठो।  कहो, कैसे आना हुआ।  किन्हें खोजते हुए आई? ज़ख्म कौनसे साथ लाई?  कैसे मेरा ध्यान आया? साथ यहां तक क्या लाया? आओ उदासी, बैठो।  बहुत दिनों बाद आई हो। खिलते हुए फूल को देखो, कल तक ये मुरझा जाएगा। उगते हुए सूरज को देखो, कुछ देर,ये भी ढल जाएगा।  आओ उदासी, बैठो।  कैसे ख़्यालों का लाना हुआ।   किन रास्तों से गुज़री तुम? किन सैलाबों में उमड़ी तुम? कहाँ से सफर शुरू था किया?  किन ठोकरों ने घाव यह दिया?     आओ उदासी, बैठो। तुम्हारा साया स्वतः  तुमसे पहले था आया। दर ओ दीवार छू कर, टकड़ाकर लड़खड़ाया। ख़ुदके कमरे पर आकर,  ख़ुद ही खटखटाया।   कभी परदों को टटोले,  तो कभी बाँहों को खोले,  बेचैन होकर बस तेरा नाम बोले।      अरे! उदासी, बैठो।  कहो, कहां तेरा जाना हुआ? बस इतनी देर में लौट रही!  कहो, ये भी कोई आना हुआ? अगली बार आओ, तो  आहट को कहना, पहले चले आए,  अपने कमरे को आकर ज़रा खुदसे सजाए।   मन में दरवाज़े बहुत हैं,  अपना चिन्हा लगाए,  कहीं ऐसा न हो,...