flash kalpana 1
चिट्ठियों के प्रति हमेशा से एक खिंचाव सा रहा। लम्बे घुंघराले बालों से भी। सायों-चुड़ैलों की कहानियों से भी। और इनके प्रति मेरे डर ने इनसे परस्पर दूरी बनवा कर रखी। बेजान बस्तियां और बिना जवाब के सवाल जब आँखों के सामने से गुज़रते हैं तो अक्सर बदन के किसी कोने से सिहरन किसी कोने तक दौड़ जाती है। देह अपने भीतर बहुत कुछ छिपा लेता है। सिहरन जानती है की उसकी भलाई छिपे रहने में है, तो वो अपने पाओं में रफ़्तार बांधे रहती है। ख़ैर क्या लिखना है? कितना लिखना है? फॉर्मेट? 5 मार्कर वाला इनफॉर्मल या 10 मार्कर वाला फॉर्मल? आखिर किसे लिखना है? आखिर हम किस लोभ में ये लिख रहे हैं? आह! प्यौर पीपल प्लीज़र! कहीं पढ़ा की आप वो नहीं है जो आप कहते हैं, आप वो हैं जो आप करते हैं। ऐक्शन्स, आदतें, एक फ्रेमवर्क जिसके थ्रू हम ऑपरेट करते हैं, इनसे शायद अब हमारी पहचान तय होने लगी है। आप अच्छे इंसान हैं या बुरे इंसान है, आपको पहचानने का पैरामीटर एक ये भी है। मोरल इंसान शायद अच्छा इंसान होता है। नहीं, वाकई में एक मोरल इंसान एक अच्छा इंसान होता है। अक्सर अच्छे इ...